अपने ही घर में मेहमान
बेटे-बहू को अपने घर में रखा... फिर केस शुरू हुए
क्या हुआ था
67 और 66 साल के एक दंपति ने शादी के बाद बेटे-बहू को अपने घर में रहने दिया।
बाद में बहू ने उन पर मुक़दमे शुरू कर दिए। माँ-बाप सीनियर सिटिज़न ट्रिब्यूनल गए, जिसने बेटे-बहू को घर ख़ाली करने का आदेश दिया।
अपीलीय ट्रिब्यूनल ने वह आदेश पलट दिया।
बीच में हाई कोर्ट ने बेटे-बहू को घर में रहने के बदले ₹20,000 महीना देने को कहा था, जो उन्होंने नहीं दिया।
दोनों पक्ष
आप जज होते तो?
नीचे फ़ैसला पढ़ने से पहले एक बार सोचिए। फिर रील के कमेंट में बताइए कि अदालत सही थी या ग़लत।
Instagram पर रील देखेंहाई कोर्ट ने अपीलीय ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया। बेटे-बहू को 30 दिन में घर ख़ाली करने और बकाया रक़म व मुक़दमे का ख़र्च देने का आदेश हुआ। अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने बुज़ुर्गों की बात को नज़रअंदाज़ किया।
“Unduly hyper-technical approach, thereby defeating the very object and purpose of the special statute.”
Bombay High Court
इस केस से क्या सीखें
सीनियर सिटिज़न क़ानून बुज़ुर्ग माँ-बाप को अपने घर में सुरक्षा देता है। घर किसके नाम है, यह काग़ज़ों में साफ़ होना चाहिए।
रोज़ एक असली केस
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- अदालत
- बॉम्बे हाई कोर्ट (औरंगाबाद बेंच)
- केस
- Chandiram Anandram Hemnani v. Senior Citizens Appellate Tribunal, 2025:BHC-AUG:15227
- बेंच
- जस्टिस प्रफुल्ल एस. खुबालकर
- फ़ैसला
- जून 2025
- स्रोत
- Verdictum
यह पेज केस की सार्वजनिक रिपोर्ट पर आधारित है और सिर्फ़ जानकारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं। हर मामला अलग होता है; अपने मामले के लिए वकील या लीगल एड से बात करें। कोई ग़लती दिखे तो हमें बताएँ, हम ठीक करेंगे।