केस 3 · बुज़ुर्ग माँ-बाप का घर

अपने ही घर में मेहमान

बेटे-बहू को अपने घर में रखा... फिर केस शुरू हुए

क्या हुआ था

67 और 66 साल के एक दंपति ने शादी के बाद बेटे-बहू को अपने घर में रहने दिया।

बाद में बहू ने उन पर मुक़दमे शुरू कर दिए। माँ-बाप सीनियर सिटिज़न ट्रिब्यूनल गए, जिसने बेटे-बहू को घर ख़ाली करने का आदेश दिया।

अपीलीय ट्रिब्यूनल ने वह आदेश पलट दिया।

बीच में हाई कोर्ट ने बेटे-बहू को घर में रहने के बदले ₹20,000 महीना देने को कहा था, जो उन्होंने नहीं दिया।

दोनों पक्ष

माँ-बापघर हमारा है। इस उम्र में हमें चैन से अपने घर में रहने का हक़ है।
बहूयह मेरा ससुराल है, मुझे यहाँ से निकाला नहीं जा सकता।

आप जज होते तो?

नीचे फ़ैसला पढ़ने से पहले एक बार सोचिए। फिर रील के कमेंट में बताइए कि अदालत सही थी या ग़लत।

Instagram पर रील देखें
अदालत का फ़ैसला

हाई कोर्ट ने अपीलीय ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया। बेटे-बहू को 30 दिन में घर ख़ाली करने और बकाया रक़म व मुक़दमे का ख़र्च देने का आदेश हुआ। अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने बुज़ुर्गों की बात को नज़रअंदाज़ किया।

“Unduly hyper-technical approach, thereby defeating the very object and purpose of the special statute.”
Bombay High Court

इस केस से क्या सीखें

सीनियर सिटिज़न क़ानून बुज़ुर्ग माँ-बाप को अपने घर में सुरक्षा देता है। घर किसके नाम है, यह काग़ज़ों में साफ़ होना चाहिए।

रोज़ एक असली केस

हर दिन एक नया फ़ैसला, आसान हिंदी में। WhatsApp चैनल जल्द आ रहा है; तब तक YouTube या Instagram पर जुड़िए।

अदालत
बॉम्बे हाई कोर्ट (औरंगाबाद बेंच)
केस
Chandiram Anandram Hemnani v. Senior Citizens Appellate Tribunal, 2025:BHC-AUG:15227
बेंच
जस्टिस प्रफुल्ल एस. खुबालकर
फ़ैसला
जून 2025
स्रोत
Verdictum

यह पेज केस की सार्वजनिक रिपोर्ट पर आधारित है और सिर्फ़ जानकारी के लिए है, क़ानूनी सलाह नहीं। हर मामला अलग होता है; अपने मामले के लिए वकील या लीगल एड से बात करें। कोई ग़लती दिखे तो हमें बताएँ, हम ठीक करेंगे।